Ahmad Faraz – Hindi Shayari

Ahmad Faraz – Hindi Shayari 

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Ahmad Faraz – Hindi Shayari 

तेरे ख्वाब

बड़ी मुश्किल से सुलाया था खुद को “फ़राज़” मैंने आज
अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर

उस की हर बात

यही सोच कर उस की हर बात को सच माना है “फ़राज़ “
के इतने ख़ूबसूरत लव झूट कैसे बोलेंगे .


दिल बेक़रार अपना है

तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है
के हम को तेरा नहीं इंतज़ार अपना है

मिले कोई भी तेरा ज़िकर छेड़ देते हैं
के जैसे सारा जहाँ राज़दार अपना है

वो दूर हो तो बजा तर्क -ऐ -दोस्ती का ख्याल
वो सामने हो तो कब इख्तियार अपना है

ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल से
इस आसरे पर के इक गमगुसार अपना है

“फ़राज़” राहत-ऐ-जान भी वही है क्या कीजिये
वो जिस के हाथ से सीनाफिगार अपना है ​

जान से इश्क़

जान से इश्क़ और जहाँ से गुरेज
दोस्तों ने किया कहाँ से गुरेज
इब्तदा की तेरे कसीदे की
अब मुश्किल करू कहाँ से गुरेज
में वहाँ हूँ जहाँ जहाँ तुम हो
तुम करोगे कहाँ कहाँ से गुरेज
कर गया तेरे मेरे किस्से मैं
दास्ताँ वो जहाँ वहाँ से गुरेज

ज़िन्दगी तो अपने ही क़दमों पे चलती है

ज़िन्दगी तो अपने ही क़दमों पे चलती है “फ़राज़ “
लोगो के सहारे तो जनाज़े उठा करते हैं

हमें तुम से प्यार है

हम पे फ़क़त इलज़ाम के हम हैं ज़ुबान दर्ज़ “फ़राज़”
हम ने तो बस कहा था हमें तुम से प्यार है

वो बेवफा न था

वो बेवफा न था यूं ही बदनाम हो गया ” फ़राज़ “
हज़ारों चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करता वो

तेरा न हो सका

तेरा न हो सका तो मर जाऊंगा “फ़राज़ “
कितना खूबसूरत वो झूट बोलता था

हम न बदलेंगे

हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘”फ़राज़”‘
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा …

खुद ही बिक गए

किस की क्या मजाल थी जो कोई हम को खरीद सकता “फ़राज़”
हम तो खुद ही बिक गए खरीदार देख कर

उम्र भर का सहारा

कौन देता है उम्र भर का सहारा ऐ “फ़राज़’
लोग तो जनाज़े में भी कंधे बदलते रहते हैं

यह वफ़ा तो

यह वफ़ा तो उन दिनों की बात है “फ़राज़”
जब मकान कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे

इश्क़ का नशा

कुछ इश्क़ का नशा था पहले हम को “फ़राज़”.
दिल जो टूटा तो नशे से मोहब्बत हो गई .

मिले तो कुछ कह न सके

हम उन से मिले तो कुछ कह न सके “फ़राज़”
ख़ुशी इतनी थी के मुलाक़ात आँसू पोंछते ही गुज़र गई

प्यासे गुज़र जाते हैं

तू किसी और के लिए होगा समंदर-ऐ -इश्क़ “फ़राज़”
हम तो रोज़ तेरे साहिल से प्यासे गुज़र जाते हैं

किसी से जुदा होना

किसी से जुदा होना अगर इतना आसान होता “फ़राज़”
जिस्म से रूह को लेने कभी फरिश्ते न आते

मुलाक़ात आँसू पोंछते ही गुज़र गई

हम उन से मिले तो कुछ कह न सके “फ़राज़ ”
ख़ुशी इतनी थी के मुलाक़ात आँसू पोंछते ही गुज़र गई

गुनहगार

लोग पत्थर के बूतों को पूज कर भी मासूम रहे “फ़राज़”
हम ने एक इंसान को चाहा और गुनहगार हो गए

मेरी ख़ामोशी

वो अब हर एक बात का मतलब पूछता है मुझसे “फ़राज़”
कभी जो मेरी ख़ामोशी की तफ्सील लिखा करता था

प्यार की गहराइयाँ

हमे तो प्यार की गहराइयाँ मालूम करनी थी “फ़राज़”
यहाँ नहीं डूबता तो कहीं और डूबे होते

बरसो के प्यासे

बस इतना ही कहा था हम बरसो के प्यासे हैं ” फ़राज़ “
होंटो को उस ने चूम कर खामोश कर दिया

रोशनियाँ

सब रोशनियाँ मुझ से रूठ जाएंगी यह कह कर ” फ़राज़ “
तुम अपने चिरगों की हिफाज़त नहीं करते

बिछडने का सलीका

उस को तो बिछडने का सलीका भी नहीं आया ” फ़राज़ “
जाते हुए वो खुद को यहीं छोड़ गया

दर्द हैरान है

एक ही ज़ख्म नहीं सारा बदन ज़ख़्मी है ” फ़राज़ “
दर्द हैरान है के उठूँ भी तो कहाँ से उठूँ

सोच में  गुम हैं

उँगलियाँ आज भी इस सोच में  गुम हैं “फ़राज़”
उस ने कैसे नया हाथ थामा होगा.

मैं जो महका

मैं जो महका तो मेरी शाख जला दी उस ने “फ़राज़”
सर्द मौसम में मुझे जर्द हवा दी उस ने

मुलाक़ात

लोग कहते हैं के मुलाक़ात नहीं हुई ” फ़राज़ “
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती

तमाम उम्र

तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ” फ़राज़ “
वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता था मुझे

अपनी नाकामी 

अपनी नाकामी का एक यह भी सबब है ” फ़राज़ ”
चीज़ जो भी मांगते हैं सब से जुदा मांगते हैं


मिज़ाज़ और धड़कन – फ़राज़

कितना नाज़ुक मिज़ाज़ है वो कुछ न पोछिए फ़राज़
नींद नही आती उन्हें धड़कन के शोर से 

जिंदगी और मौत – फ़राज़

कोई न आएगा तेरे सिवा मेरी जिंदगी में फ़राज़
एक मौत ही है जिस का हम वादा नही करती 

तन्हाई और महफ़िल – फ़राज़

तन्हाई में जो चूमता है मेरे नाम के हरूफ फ़राज़
महफ़िल मैं वो शख्स मेरी तरफ देखता भी नहीं 

बेवफा और ज़िंदगी – फ़राज़

वो बेवफा है सही आओ उसी याद कर लें फ़राज़
अभी ज़िंदगी बहुत पड़ी है उसे भुलाने के लिए 

खुश और उदास – फ़राज़

वो मुझ से बिछड़ कर खुश है तो उसे खुश रहने दो “फ़राज़ “
मुझ से मिल कर उस का उदास होना मुझे अच्छा नहीं लगता …

ख्वाब – फ़राज़

वो मुझसे पूछता किस किस के ख्वाब देखते हो “फ़राज़ ”
बेखबर जानता नहीं के यादें उसकी सोने कहाँ देती हैं ..

हम कभी मिल सकें मगर

हम कभी मिल सकें मगर , शायद
जिनके हम मुन्तज़र रहे, उनको मिल गए और हमसफ़र शायद

जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त , गौर कर शायद, अजनबीयत की धुंध छट जाए
चमक उठे तेरी नज़र शायद

ज़िन्दगी भर लहू रुलाएगी
याद -ऐ -यारां -ऐ -बेखबर शायद

जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं ‘फ़राज़ ’
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद ..!!!


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1 Comments

  1. 2021 Bollywood Songs
    I will prefer this blog because it has much more informative stuff.

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