MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

Mohsin Naqvi Hindi Shayari

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी


मौसम-ए-ज़र्द में एक दिल को बचाऊँ कैसे

मौसम-ए-ज़र्द में एक दिल को बचाऊँ कैसे
ऐसी रुत में तो घने पेड़ भी झड़ जाते हैं



हर रास्ता सुनसान हुआ

जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रास्ता सुनसान हुआ
अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ



फटे हुए थे सभी बादलों के मश्कीज़े

पलट के आ गई ख़ेमे की सम्त प्यास मिरी
फटे हुए थे सभी बादलों के मश्कीज़े



अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था

अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDIमोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

ताज़ा लहू चमके
शाख़-ए-उरियाँ पर खिला इक फूल इस अंदाज़ से
जिस तरह ताज़ा लहू चमके नई तलवार पर



 रौशन इक तारीक मकान हुआ

जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बेकार समझते थे
उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ



ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे

तुम्हें जब रू-ब-रू देखा करेंगे
ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें

अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता
भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें



वो तो याद हमें भूल कर भी आता है

वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था
कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है



उसका पैगाम हवा में आये

सोज़ इतना तो नवा में आये ...
उसका पैगाम हवा में आये

यूँ अचानक तुझे पाया मैं ने
जैसे तासीर दुआ में आये

रोग क्या जी को लगा है मोहसिन
ज़हर का नाम दवा में आए .. 



जो सुनायी दे उसे चुप सिखा

न सन्नाटों में तपिश घुले,
न नज़र को वक्फ-ए-अजाब कर
जो सुनायी दे उसे चुप सिखा,
जो दिखायी दे उसे ख्वाब कर

अभी मुंतशिर न हो अजनबी,
न विसाल रुत के करम जता
जो तेरी तलाश में गम हुवे,
कभी उन दिनों का हिसाब कर

मेरे सब्र पर कोई अज्र क्या,
मेरी दोपहर पे ये अब्र क्यूँ ?
मुझे ओढने दे अज़ीयतें,
मेरी आदतें न ख़राब कर

कहीं आबलों के भंवर बजे,
कहीं धुप रूप बदन सजे
कभी दिल को थाल का मिज़ाज दे
कभी चाम-ए-तर को चनाब कर

ये हुजूम-ए शहर-ए-सितमगरां ,
न सुनेगा तेरी सदा कभी
मेरी हसरतों को सुखन सुना,
मेरी खवाहिशों से ख़िताब कर ...

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

तू मेरा नाम न पूछा कर
मैं तेरी सोच में शामिल हूँ
मैं तेरी नींद का किस्सा हूँ
मैं तेरे खवाब का हासिल हूँ

मैं तेरी याद का माहवार हूँ
मैं तेरी साँस का झोंका हूँ
तू मंज़र, मैं पस मंज़र हूँ
मैं लम्हा हूँ मैं जज्बा हूँ

जज्बे का कोई नाम नहीं
तू मेरा नाम न पूछा कर



तुम्हें जब रु-बरु देखा करेंगे

तुम्हें जब रु-बरु देखा करेंगे
ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे

नज़र में चौहदवी का चाँद होगा
समुन्दर की जुबान बोला करेंगे

तुम्हारा अक्स जब उतरेगा दिल में
बदन में आईने टूटा करेंगे

बिछड़ना है तो ये तय कर लें अभी से
जुदाई का सफ़र तनहा करेंगे

न आयेगा कोई इलज़ाम तुम पर
हम अपने आप को रुसवा करेंगे

एक उलझन में कटी है उमर मोहसिन
के पल दो पल में हम क्या क्या करेंगे !


मेरे आँगन में कभी फूल खिला करते थे

मेरे आँगन में कभी फूल खिला करते थे
मेरी आँखों में भी कुछ खवाब बसा करते थे

मुझ को हालात की आंधी ने गिराया वरना
मेरे सीने में भी कुछ लोग रहा करते थे

है मुझे याद रफाकात की वो गहराइयाँ अभी भी
दिल की धड़कन भी तेरी साफ़ सुना करते थे

आज महफ़िल में वो अंजान बने बैठे हैं
जो कभी मुझे अपनी जान कहा करते थे

अब तरसती हैं तेरी दीद को आँखें मोहसिन
एक ज़माना था के हम रोज़ मिला करते थे



मेरे सनम मुस्कुरा न देना

उदास तहरीर पढ़ के मेरी, मेरे सनम मुस्कुरा न देना
ये आखरी ख़त मैं लिख रहा हूँ, ख्याल करना जला न देना

गुज़र रही है तुम्हारी कैसे, बिछड़ के हम से रुला के हमको
हकीकतों को ज़रूर लिखना, अना की खातिर छुपा न देना

कोई पूछे किधर गया वो, जो तेरी महफ़िल का था सहारा
जो फुर्क़तों का सबब बने थे, किसी बशर को बता न देना

मैं मर भी जाऊ तो मुस्कुराना, एहसास-ए-गम की न चोट खाना
जो कुर्ब-ए-ग़म से निगाहें भीगें तो रुख से आँचल हटा न देना

लहू से तहरीर कर रहा हूँ, मैं अपनी सारी कहानी मोहसिन
जो फाड़ भी दो तो पास रखना, हवा में टुकड़े उड़ा न देना



कभी याद आओ तो इस तरह
कभी याद आओ तो इस तरह
कि लहू की सारी तमाज़तें
तुम्हे धूप धूप समेट लें 
तुम्हे रंग रंग निखार दें
तुम्हे हर्फ़ हर्फ में सोच लें
तुम्हे देखने का जो शौक हो
तू दयार-ए-हिज्र की तीरगी
कोह मिचगां से नोच लें
कभी याद आओ तो इस तरह
कि दिल-ओ-नज़र में उतर सको
कभी हद से हब्स-ए-जुनू बढ़े
तो हवस बन के बिखर सको
कभी खुल सको शब-ए-वस्ल में
कभी खून-ए-दिल में सँवर सको
सर-ए-रहगुज़र जो मिलो कभी
न ठहर सको न गुज़र सको
मेरा दर्द फिर से ग़ज़ल बुने
कभी गुनगुनाओ तो इस तरह
मेरे जख्म फिर से गुलाब हों
कभी मुस्कुराओ तो इस तरह
मेरी धड़कनें भी लरज़ उठें
कभी चोट खाओ तो इस तरह
जो नहीं तू फिर बड़े शौक से
सभी राब्ते सभी जाब्ते
कभी धूप छांव में तोड़ दो
न शिकस्त-ए-दिल का सितम सहो
न सुनो किसी का अज़ाब-ए-जाँ
न किसी से अपनी ख़लिश कहो
यूंही खुश फिरो यूंही खुश रहो
न ऊजड़ सकें न सँवर सकें
कभी दिल दुखाओ तो इस तरह
न सिमट सकें न बिखर सकें
कभी भूल जाओ तो इस तरह
किसी तौर जाँ से गुज़र सकें
कभी याद आओ तो इस तरह



दुआ नहीं तो गिला देता कोई

दुआ नहीं तो गिला देता कोई
मेरी वफाओं का सिला देता कोई

जब मुकद्दर ही नहीं था अपना
देता भी तो भला क्या देता कोई

हासिल-ए-इश्क फकत दर्द है
ये काश पहले बता देता कोई

तकदीर नहीं थी अगर आसमान छूना
ख़ाक में ही मिला देता कोई

बेवफा ही हमें बेवफा कह गया
इस से ज्यादा क्या दगा देता कोई

गुमान ही हो जाता किसी अपने का
दामन ही पाकर हिला देता कोई

अरसे से अटका है हिचकियों पे दिन
अच्छा होता के भूला देता कोई


दिल भी धड़के
बादल बरसें !
बादल इतनी ज़ोर से बरसें
मेरे शहर की बंजर धरती
गुमसुम खाक उड़ाते रस्ते
सुखाएचेहरे पीली अंखियन
बोसीदा मटियाले पैकर ऐसी बहकें
अपने को पहचान न पाएँ

बिजली चमके !
बिजली इतनी ज़ोर की चमके
मेरे शहर की सूनी गलियाँ
मुद्दत्त के तारीक झरोखे
पुर'इसरार खंडहर वीराने
माज़ी की मद्धम तस्वीरें ऐसी चमकें
सीने का हर भेद ऊगल दें

दिल भी धड़के !
दिल भी इतनी ज़ोर से धड़के
सोचों की मजबूत तनाबे
ख्वाहिश की अनदेखी गिरहें
रिश्तों की बोझल ज़ंजीरें, एक छंके से खुल जाएँ
सारे रिश्ते
सारे बंधन
चाहूँ भी तो याद ना आएँ
आखें, अपनी दीद को तरसें
बादल इतने ज़ोर से बरसें 

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

ज़रा सी देर में हम कैसे खोलते उसको

ज़रा सी देर में हम कैसे खोलते उसको
तमाम उमर लगी झूठ बोलते उसको

जिसे काशीद किया था खुमार-ए-खुश्बू से
मिसाल-ए-रंग हवाओं में घोलते उसको

वो ख्वाब में ही उतरता शुआ-ए-सुबह के साथ
हम अपने आप ही पलकों पे तौलते उसको

वो अश्क था उसे आँखों में दफ़न होना था
गोहर न था के सितारों में तोलते उसको

वो बे-वफ़ा था तो इकरार लाज़मी करता
कुछ और देर मेरी जान टटोलते उसको

किसी की आँख से “मोहसिन” ज़रूर पीता है
तमाम शहर ने देखा है डोलते उसको 


मेरी तरह किसी से मुहब्बत उसे भी थी

ज़िक्र-ए-शब-ए-फिराक से वहशत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मुहब्बत उसे भी थी

मुझको भी शौक था नए चेहरों कि दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी

उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ्तगू
मसरूफ़ मैं भी कम था फरागत उसे भी थी

सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
ताज़ा रफाकतों की ज़रूरत उसे भी थी

मुझ से बिछड़ के शहर में घुल मिल गया वो शख्स
हालांकि शहर भर से अदावत उसे भी थी

वो मुझ से बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया
वरना हर एक सांस क़यामत उसे भी थी 


काश बनाने वाले ने मुझे किताब बनाया होता

काश बनाने वाले ने मुझे किताब बनाया होता
वोह पढ़ते पढ़ते सो जाती मुझे सीने से लगाया होता

मैं उसके गम में रोता और रोता ही जाता
उस ने चुपके से मुझे सीने से लगाया होता

उस को दास्तान सुना सुना के थक सा गया
काश उस ने भी मुझे हाल-ए-दिल सुनाया होता

मैं उस का नाम लेता और सुबहो शाम लेता था
है अफ़सोस उस ने मुझे एक बार बुलाया होता

मैं उस की खातिर तड़पता रहा शाम ओ सहर 'मोहसिन'
अरमान न होता गर उसने एक आंसू ही बहाया होता 


नज़र में ज़ख़्म-ए-तबस्सुम छुपा छुपा के मिला

नज़र में ज़ख़्म-ए-तबस्सुम छुपा छुपा के मिला
खफा तो था वो मगर मुझ से मुस्कुरा के मिला

वो हमसफ़र के मेरे तंज़ पे हंसा था बोहत
सितम ज़रीफ़ मुझे आइना दिखा के मिला

मेरे मिज़ाज पे हैरान है ज़िन्दगी का शऊर
मैं अपनी मौत को अक्सर गले लगा के मिला

मैं उस से मांगता क्या? खून बहा जवानी का
के वो भी आज मुझे अपना घर लुटा के मिला

मैं जिस को ढूँढ रहा था नज़र के रास्ते में
मुझे मिला भी तो ज़ालिम नज़र झुका के मिला

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म बदन ले के चल दिया “मोहसिन”
वो जब भी अपनी काबा पर कँवल सजा के मिला


जाने अब किस देस मिलेंगे ऊँची जातों वाले लोग ?
जाने अब किस देस मिलेंगे ऊँची जातों वाले लोग ?
नेक निगाहों, सच्चे जज्बों की सौगातों वाले लोग

प्यास के सहराओं में धूप पहेन कर पलते बंजारों …!
पलकों ओट तलाश करो , बोझल बरसातों वाले लोग

वक़्त की उड़ती धूल में अपने नक्श गंवाए फिरते हैं,
रिम झिम सुबहों, रोशन शामों, रेशम रातों वाले लोग

एक भिकारन ढूँढ रही थी रात को झूठे चेहरों में,
उजले लफ़्ज़ों, सच्ची बातों की खैरातों वाले लोग

आने वाली रोग रुतों का पुरसा दें हर लड़की को …!
शेहनाई का दर्द समझ लें गर बारातों वाले लोग

पत्थर कूटने वालों को भी शीशे जैसी सांस मिले !!
“मोहसिन ” रोज़ दुआएं मांगें ज़ख़्मी हाथों वाले लोग 


वोह दिल का बुरा, न बेवफा था

वोह दिल का बुरा, न बेवफा था
बस, मुझ से यूंही बिछड़ गया था

लफ़्ज़ों की हदों से मावरा था
अब किस से कहूँ वोह शख्स कहाँ था ?

वोह मेरी ग़ज़ल का आइना था
हर शख्स यह बात जानता था

हर सिमत उसी का तज़करा था
हर दिल में वोह जैसे बस रहा था

मैं उस की अना का आसरा था
वोह मुझ से कभी न रूठता था

मैं धुप के बन में जल रहा था
वोह साया-अब्र बन गया था

मैं बाँझ रुतों का आशना था
वोह मोसम-ए-गुल का ज़ाइका था

एक बार बिछड़ के जब मिला था
वोह मुझ से लिपट के रो पड़ा था

क्या कुछ न उस से कहा गया था?
उस ने तो लबों को सी लिया था

वोह चाँद का हमसफ़र था शायद
रातों को तमाम जगता था

होंटों में गुलों की नरम खुशबू
बातों में तो शहद घुलता था

कहने को जुदा था मुझ से लेकिन
वोह मेरी रगों में गूंजता था

उस ने जो कहा, किया वोह दिल ने
इंकार का किस में हौसला था

यूँ दिल में थी याद उसकी जैसे
मस्जिद में चराग जल रहा था

मत पूछ हिजाब के करीने
वोह मुझ से भी कम ही खुल सका था

उस दिन मेरा दिल भी था परेशां
वोह भी मेरे दिल से कुछ खफा था

मैं भी था डरा हुवा सा लेकिन
रंग उस का भी कुछ उड़ा उड़ा था

एक खोफ सा हिज्र की रुतों का
दोनों पे मोहित हो चला था

एक राह से मैं भी था गुरेज़ाँ
एक मोड़ पे वोह भी रुक गया था

एक पल में झपक गईं जो आँखें
मंज़र ही नज़र में दूसरा था

सोचा तो ठहर गए ज़माने
देखा तो वोह दूर जा चुका था

कदमों से ज़मीन सिरक गयी थी
सूरज का भी रंग सांवला था

चलते हुवे लोग रुक गए थे
ठहरा हुवा शहर घूमता था

सहमे हुवे पेड कांपते थे
पत्तों में हीरस रेंगता था

रखता था मैं जिसमें खवाब अपने
वोह कांच का घर चटख गया था

हम दोनों का दुःख था एक जैसा
एहसास मगर जुदा जुदा था

कल शब वोह मिला था दोस्तों को
कहते हैं उदास लग रहा था

मोहसिन यह ग़ज़ल ही कह रही है
शायद तेरा दिल दुःख हुवा था


वो चाहने वालो को मुखातिब नही करता

वो चाहने वालो को मुखातिब नही करता
और तर्क-ए-तालुक की मैं वजाहत नही करता

वो अपनी जफ़ाओं पे नादिम नही होता
मैं अपनी वफाओं की तिजारत नही करता

खुशबू किसी ताश-हीर की मुहताज नही होती
सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नही करता

एहसास की सूली पे लटक जाता हूँ अक्सर
मैं जब्र-ए-मुसल्सल की शिकायत नही करता

मैं अजमत-ए-इन्सान का कायल तो हूँ मोहसिन
लेकिन कभी बन्दों की इबादत नही करता



मेरी बाँझ ज़मीं को कपास क्या देगा

जो दे सका न पहाड़ों को बर्फ़ की चादर
वो मेरी बाँझ ज़मीं को कपास क्या देगा



खिलौने बेचने वाला

वो अक्सर दिन में बच्चों को सुला देती है इस डर से
गली में फिर खिलौने बेचने वाला न आ जाए



मगर किनारा नहीं चलेगा

अज़ल से क़ाएम हैं दोनों अपनी ज़िदों पे ‘मोहसिन’
चलेगा पानी मगर किनारा नहीं चलेगा



गुलाबों के ज़ख़्म काँटों से सी रहा हूँ

कहाँ मिलेगी मिसाल मेरी सितमगरी की
कि मैं गुलाबों के ज़ख़्म काँटों से सी रहा हूँ



 ख़ुद से तक़ाज़े थे इख़्तिसार के भी

वो लम्हा भर की कहानी कि उम्र भर में कही
अभी तो ख़ुद से तक़ाज़े थे इख़्तिसार के भी


इतनी मुद्दत बाद मिले हो!
इतनी मुद्दत बाद मिले हो!
किन सोचों में गुम रहते हो?
इतने खाईफ क्यों रहते हो?
हर आहट से डर जाते हो।

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन

ये सोच लिया है के किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन !
के अब मैं भी तो देखूं कोई कितना तलबगार है मेरा



मगर ज़र्फ़ आसमान का है

मैं खुद ज़मीन हूँ मगर ज़र्फ़ आसमान का है
के टूट कर भी मेरा हौसला चट्टान का है
बुरा न मान मेरे हर्फ ज़हर-ज़हर से हैं
मैं क्या करूँ के येही जायका जुबान का है 



हम आईना साफ़ करते रहे 

बस एक ही गलती हम सारी ज़िन्दगी करते रहे मोहसिन
धुल चेहरे पर थी और हम आईना साफ़ करते रहे 



दिलों की बस्ती को लोग

दिलों की बस्ती को लोग मोहसिन
उजाड़ उजाड़ के ये कह गए हैं .!
जहाँ वफाओं में खोट देखो
वहां कभी भी खड़े न रहना ..!



बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती

उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती
बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है

मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फितरत कब बदलती है
सो, जब हम दूर हो जाएं, नए रिश्तों में खो जाएं

तो यह मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी
नहीं ऐसे नहीं होगा ..

मेरे बारे में गर तुम्हारी आंखें भर आयें
छलक कर एक भी आंसू पलक पे जो उतर आये

तो बस इतना समझ लेना,
जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अकीदत है

तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है
मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है

मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है
मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती

उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती ?.!!



जब भी मुझे दिल से पुकारा

उसने जब जब भी मुझे दिल से पुकारा मोहसिन
मैंने तब तब यह बताया के तुम्हारा मोहसिन

लोग सदियों की खताओं पे भी खुश बसते हैं
हमको लम्हों की वफाओं ने उजाड़ा मोहसिन

जब आगया हो ये यकीन अब वोह नहीं आयेगा
गम और आंसू ने दिया दिल को सहारा मोहसिन

वोह था जब पास तो जीने को भी दिल करता था
अब तो पल भर भी नहीं होता गुज़ारा मोहसिन

उसको पाना तो मुक़द्दर की लकीरों में नहीं
उसका खोना भी करें कैसा गवारा मोहसिन



वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है 

वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है
वोह सच कहे न कहे ऐतबार करना है

यह तुझ को जागते रहने का शौक कब से हुआ?
मुझे तो खैर तेरा इंतजार करना है

हवा की ज़द में जलाने हैं आंसूं के चिराग
कभी ये जशन सर ए-राह-गुज़र करना है

वोह मुस्कुरा के नए वास-वासों में ढल गया
ख़याल था के उसे शरमसार करना है

मिसाल-ए-शाख-ए बढ़ाना खिजान की रुत में कभी
खुद अपने जिसम को बे बर्ग ओ बार करना है

तेरे फ़िराक में दिन किस तरह कटें अपने
कि शुगल-ए-शब् तो सितारे शुमार करना है

चलो ये अश्क ही मोती समझ के बेच आये
किसी तरह तो हमें रोज़गार करना है

कभी तो दिल में छुपे ज़ख़्म भी नुमायाँ हों
काबा समझ के बदन तार तार करना है

खुदा जाने ये कोई जिद, के शौक है मोहसिन
खुद अपनी जान के दुश्मन से प्यार करना है 



उसको फुर्सत ही नहीं

उसको फुर्सत ही नहीं
वक़्त निकाले मोहसिन
ऐसे होते हैं भला
चाहने वाले मोहसिन

याद की दश्त में फिरता हूँ
मैं नंगे पांव
देख तो आ के कभी
पांव के छाले मोहसिन

खो गई सुबह की उम्मीद
और अब लगता है
हम नहीं होंगे
की जब होंगे उजाले मोहसिन

वो जो इक शख्स
मता-ए-दिल-ओ-जान था
न रहा
अब भला कौन मेरे
दर्द संभाले मोहसिन 



एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी

एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने आये भी घबराये भी

रात गए घर जाने वाली गुमसुम लड़की राहों में
अपनी उलझी जुल्फों को सुलझाए भी घबराये भी

कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा क्यों आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे समझाये भी घबराये भी

आने वाली रुत का कितना खौफ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाए भी घबराये भी 



जब से उस ने शहर को छोड़ा

जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रास्ता सुनसान हुआ
अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुकसान हुआ

मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तनहा मौसम में
पत्थर भी रो पड़ते हैं इन्सान तो फिर इन्सान हुआ

उस के ज़ख्म छुपा कर रखिये खुद उस शख्स की नज़रों से
उस से कैसा शिकवा कीजिये वो तो अभी नादाँ हुआ

यूँ भी कम आमेज़ था “मोहसिन” वो इस शहर के लोगों में
लेकिन मेरे सामने आकार और ही कुछ अंजाम हुआ



अब तेरी याद से वेहशत नहीं होती मुझको

अब तेरी याद से वेहशत नहीं होती मुझको
ज़ख्म खुलते हैं, अजीयत नहीं होती मुझको

अब कोई आये, चला जाए, मैं खुश रहता हूँ
अब किसी शक्स की आदत नहीं होती मुझको

ऐसा बदला हूँ, तेरे शहर का पानी पी कर
झूठ बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझको

है अमानत में खयानत, सो किसी की खातिर
कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझको

इतना मसरूफ हूँ जीने की हवस में 'मोहसिन'
सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती मुझको



रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
आँख सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो

लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं
सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो

ये ज़ुरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो

शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत हैं 'मोहसिन'
दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो



बहार रुत मे उजड़े रस्ते, तका करोगे तो रो पड़ोगे

बहार रुत मे उजड़े रस्ते,
तका करोगे तो रो पड़ोगे
किसी से मिलने को जब भी मोहसिन,
सजा करोगे तो रो पड़ोगे

तुम्हारे वादों ने यार मुझको,
तबाह किया है कुछ इस तरह से
कि जिंदगी में जो फिर किसी से,
दगा करोगे तो रो पड़ोगे…

मैं जानता हूँ मेरी मुहब्बत,
उजाड़ देगी तुम्हें भी ऐसे …
कि चाँद रातों मे अब किसी से,
मिला करोगे तो रो पड़ोगे…

बरसती बारिश में याद रखना,
तुम्हें सतायेंगी मेरी आँखें …
किसी वली के मज़ार पर जब
दुआ करोगे तो रो पड़ोगे…!!!



दिल यूँ धड़का के परेशान हुआ हो जैसे

दिल यूँ धड़का के परेशान हुआ हो जैसे
कोई बे-ध्यानी में नुकसान हुआ हो जैसे

रुख बदलता हूँ तो शह रग में चुभन होती है,
इश्क भी जंग का मैदान हुआ हो जैसे,

जिस्म यूँ लम्स-ए-रफाकात के असर से निकला,
दुसरे दौर का सामान हुआ हो जैसे

दिल ने यूँ फिर मेरे सीने में फकीरी रख दी,
टूट कर खुद ही पशेमान हुआ हो जैसे,

थाम कर हाथ मेरा ऐसा वोह रोया मोहसिन,
कोई काफिर से मुसलमान हुआ हो जैसे ...!

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है

एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
मुझ को मेरे ही ख्यालों में सदा देता है

वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन
जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है

मैं जो अन्दर से कभी टूट के बिखरूं
वो मुझ को थामने के लिए हाथ बढ़ा देता है

मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

उस की कुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है 



क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच

क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच
अब तो खुलने लगे मकतल भरे बाज़ार के बीच

अपनी पोषक के छीन जाने पे अफ़सोस न कर
सर सलामत नहीं रहते यहाँ दस्तर के बीच

सुर्खिया अमन की तलकीन में मसरूफ रहें
हर्फ़ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच

काश इस खवाब की ताबीर की मोहलत न मिले
शोले उगते नज़र आये मुझे गुलज़ार के बीच

ढलते सूरज की तमाज़त ने बिखर कर देखा
सर कशीदा मेरा साया साफ-ए-अश्जार के बीच

रिज्क़, मल्बोस, मकान, साँस, मर्ज़, कर्ज़, दवा
मुन्किसम हो गया इन्सान इन्हें अफकार के बीच

देखे जाते न थे आंसू मेरे जिस से मोहसिन
आज हँसते हुए देखा उसे अगयार के बीच



काश आ जाये वो मुझे जान से गुज़रते देखे

काश आ जाये वो मुझे जान से गुज़रते देखे
खवाहिश थी कभी मुझ को बिखरते देखे

वो सलीके से हुआ हम से गुरेज़ाँ वरना
लोग तो साफ़ मोहब्बत से मुकरते देखे

वक़त होता है हर एक ज़ख़्म का मरहम मोहसिन
फिर भी कुछ ज़ख़्म थे ऐसे जो न भरते देखे


ख्वाब आँखों में चुभो कर देखूं

ख्वाब आँखों में चुभो कर देखूं
काश मैं भी कभी सो कर देखूं

शायद उभरे तेरी तस्वीर कहीं
मैं तेरी याद में रो कर देखूं

इसी ख्वाहिश में मिटा जाता हूँ
तेरे पांव, तेरी ठोकर देखूं

अश्क हैं, वहम की शबनम, के लहू ??
अपनी पलकें तो भिगो कर देखूं

केसा लगता है बिछड़ कर मिलना ?
मैं अचानक तुझे खो कर देखूं

अब कहाँ अपने गिरेबान की बहार ?
तार में ज़ख्म पिरो कर देखूं

मेरे होने से न होना बेहतर
तू जो चाहे, तेरा हो कर देखूं ?

रूह की गर्द से पहले मोहसिन
दाग़-ए-दमन को तो धो कर देखूं ..!!



जब तेरी धुन में जिया करते थे

जब तेरी धुन में जिया करते थे
हम भी चुप चाप फिरा करते थे

आँख में प्यास हुवा करती थी
दिल में तूफ़ान उठा करते थे

लोग आते थे ग़ज़ल सुनने को
हम तेरी बात किया करते थे

सच समझते थे तेरे वादों को
रात दिन घर में रहा करते थे

किसी वीराने में तुझसे मिलकर
दिल में क्या फूल खिला करते थे

घर की दीवार सजाने के लिए
हम तेरा नाम लिखा करते थे

वोह भी क्या दिन थे भुला कर तुझको
हम तुझे याद किया करते थे

जब तेरे दर्द में दिल दुखता था
हम तेरे हक में दुआ करते थे

बुझने लगता जो चेहरा तेरा
दाग सीने में जला करते थे

अपने जज्बों की कमंदों से तुझे
हम भी तस्खीर किया करते थे

अपने आंसू भी सितारों की तरह
तेरे होंटों पे सजा करते थे

छेड़ता था गम-ए-दुनिया जब भी
हम तेरे गम से गिला करते थे

कल तुझे देख के याद आया है
हम सुख्नूर भी हुआ करते थे



वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है

वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है
वोह सच कहे न कहे ऐतबार करना है

यह तुझ को जागते रहने का शौक कब से हुआ?
मुझे तो खैर तेरा इंतजार करना है

हवा की ज़द में जलाने हैं आंसूं के चिराग
कभी ये जशन सर ए-राह-गुज़र करना है

वोह मुस्कुरा के नए वास-वासों में ढल गया
ख़याल था के उसे शरमसार करना है

मिसाल-ए-शाख-ए बढ़ाना खिजान की रुत में कभी
खुद अपने जिस्म को बे बर्ग ओ बार करना है

तेरे फ़िराक में दिन किस तरह कटें अपने
कि शुगल-ए-शब् तो सितारे शुमार करना है

चलो ये अश्क ही मोती समझ के बेच आये
किसी तरह तो हमें रोज़गार करना है

कभी तो दिल में छुपे ज़ख़्म भी नुमायाँ हों
काबा समझ के बदन तार तार करना है

खुदा जाने ये कोई जिद, के शौक है मोहसिन
खुद अपनी जान के दुश्मन से प्यार करना है


तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही

तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही
हमारी जान थी, जान पर वबाल वैसे ही

चला था ज़िकर ज़माने की बे वफाई का
सो आ गया है तुम्हारा ख्याल वैसे ही

हम आ गए हैं तह-ए-दाम तो नसीब अपना
वरना उस ने तो फेंका था जाल वैसे ही

मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उस का
गिरी नहीं मेरे हाथों से ढाल वैसे ही

मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का
मोहसिन उस ने भी पूछा था हाल वैसे ही 



दिया खुद से बुझा देना

दिया खुद से बुझा देना
हवा को और क्या देना ?

सितारे नोचने वालो
फलक को आसरा देना

कभी इस तौर से हँसना
के दुनिया को रुला देना

कभी इस रंग से रोना
के खुद पर मुस्करा देना

मैं तेरी दस्तरस चाहूँ
मुझे ऐसी दुआ देना

मैं तेरा बरमला मुजरिम
मुझे खुल कर सजा देना

मैं तेरा मुनफ़रिद साथी
मुझे हट कर सजा देना

मेरा सर सब से ऊँचा है
मुझे मकतल नया देना

मुझे अच्छा लगा "मोहसिन "
उसे पा कर गँवा देना

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

कुछ तो ऐ यार इलाज-ए-गम-ए-तन्हाई हो 

कुछ तो ऐ यार इलाज-ए-गम-ए-तन्हाई हो
बात इतनी भी न बढ़ जाये कि रुसवाई हो

जिस ने भी मुझको तमाशा सा बना रखा है
अब ज़रूरी है वोही आँख तमाशाई हो

डूबने वाले तो आँखों से भी खूब निकले हैं
डूबने के लिए लाजिम नहीं, गहराई हो

मैं तुझे जीत भी तोहफे में नहीं दे सकता
चाहता ये भी नहीं हूँ तेरी पासपाई हो

कोई अन्जान न हो शहर-ए-मोहब्बत का मकीं
काश हर दिल की हर इक दिल शहनसई हो

यूँ गुज़र जाता है मोहसिन तेरे कुचे से वोह
तेरा वाकिफ न हो जैसे कोई सौदाई हो ..!


रेशम ज़ुल्फों, नीलम आँखों वाले अच्छे लगते हैं
रेशम ज़ुल्फों, नीलम आँखों वाले अच्छे लगते हैं 
मैं शायर हूँ मुझ को उजले चेहरे अच्छे लगते हैं

तुम खुद सोचो आधी रात को ठंडे चाँद की छांवों में
तन्हा राहों में हम दोनों कितने अच्छे लगते हैं

आखिर आखिर सच्चे कौल भी चुभते हैं दिल वालों को
पहले पहले प्यार के झूठे वादे अच्छे लगते हैं

काली रात में जगमग करते तारे कौन बुझाता है
किस दुल्हन को ये मोती ये गहने अच्छे लगते हैं

जब से वो परदेस गया है शहर की रौनक रूठ गई
अब तो अपने घर के बंद दरीचे अच्छे लगते हैं

कल उस रूठे रूठे यार को, देखा तो महसूस हुआ
मोहसिन उजले जिस्म पे मैले कपड़े अच्छे लगते हैं



एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है

एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
मुझ को मेरे ही ख्यालों में सदा देता है

वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन
जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है

मैं जो अन्दर से कभी टूट के बिखरूं
वो मुझ को थामने के लिए हाथ बढ़ा देता है

मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

उस की कुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है 


सुनो ऐसा नहीं करते

सुनो ऐसा नहीं करते
सफ़र तन्हा नहीं करते

जिसे शफफ़ रखना हो
उसे मैला नहीं करते

बोहत उजड़े हुए घर पे
बोहत सोचा नहीं करते

सफ़र जिस के मुक़द्दर हो
उसे रोका नहीं करते

जो मिल कर खुद से खो जाये
उसे रुसवा नहीं करते

यह ऊँचाइओं पे कैसे हैं
कही साया नहीं करते

चलो तुम राज़ हो अपना
तुम्हें अफशां नहीं करते

तेरी आँखों को पढ़ते हैं
तुझे देखा नहीं करते

सहर से पूछ लो “मोहसिन”
के हम सोया नहीं करते

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी
रुखसत हुआ तो बात मेरी मान कर गया

रुखसत हुआ तो बात मेरी मान कर गया
जो उस के पास था, मुझे दान कर गया

बिछड़ा कुछ इस अदा से के रुत ही बदल गयी
इक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया

दिल-चस्प वाकिया था के कल इक अज़ीज़ दोस्त
अपने मुफाद पर मुझे कुर्बान कर गया

कितनी सुधर गयी है जुदाई में ज़िन्दगी
हाँ वो वफ़ा से मुझ पर एहसान कर गया


“मोहसिन” मैं बात बात पर कहता था जिस को जान
वो शख्स आखिर मुझ को बे-जान कर गया 



उजड़े हुए लोगों से गुरे-जान न हुआ कर

उजड़े हुए लोगों से गुरे-जान न हुआ कर
हालत की कबरों के यह कत्बे भी पढ़ा कर

हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न करदे
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर

इस शब् के मुक़द्दर में सहर ही नहीं “मोहसिन”
हम ने देखा है कई बार चरागों को बुझा कर 



तमाम शब् जहाँ जलता है इक उदास दिया

तमाम शब् जहाँ जलता है इक उदास दिया
हवा की राहों में इक ऐसा घर भी आता है

वोह मुझे टूट के चाहेगा, छोड़ जायेगा
मुझे खबर थी उसे ये हुनर भी आता है

वफ़ा की कौनसी मंजिल पे छोड़ा है उस ने
के वोह याद हमें भूल कर भी आता है

इसीलिए मैं किसी शब् न सो सका “मोहसिन”
वोह माहताब कभी बाम पर भी तो आता है 


ज़िन्दगी क्या है कभी दिल मुझे समझाए तो

ज़िन्दगी क्या है कभी दिल मुझे समझाए तो
मौत अच्छी है अगर वक़्त पे आ जाये तो

मुझ को जिद है के जो मिलना है फलक से उतरे
उस की खवाहिश है दामन कोई फैलाये तो

कितनी सदियों की रफ़ाक़त, मैं उसे पहना दूँ
शर्त यह है वोह मुसाफिर कभी लौट आये तो

धूप “मोहसिन ” है ग़नीमत मुझे अब भी लेकिन
मेरी तन्हाई को साया मेरा बहलाए तो _____ ! 



अब के सादा कागज़ पर

अब के सादा कागज़ पर
सुर्ख रोशनाई से
उस ने तल्ख़ लहजे में
मेरे नाम से पहले
सिर्फ 'बेवफा' लिखा !!



वो मायूसी के लम्हों में

वो मायूसी के लम्हों में,
ज़रा भी हौसला देता ... मोहसिन !

तो हम कागज़ की कश्ती पे,
समंदर में उतर जाते...!



फासले बढ़ गए हैं

फासले बढ़ गए हैं ..............
और कमबख्त मोहब्बत भी......



यह जो हम हैं न

यह जो हम हैं न !!!!
एहसास में जलते हुए लोग

हम ज़मीनजाद न होते
तो सितारे होते 


तो अपने आप से नज़रें चुरा लेना 

तुम जब भी आईना देखो
तो अपने आप से नज़रें चुरा लेना

के अक्सर बेवफा लोगों को
जब वो आईना देखें



तमाम उमर वोही किस्सा-ए-सफ़र कहना

तमाम उमर वोही किस्सा-ए-सफ़र कहना
के आ सका न हमें अपने घर को घर कहना

जो दिन चढ़े तो तेरे वस्ल की दुआ करना
जो रात हो तो दुआ को ही बे-असर कहना

वो शख्स मुझसे बोहत बदगुमान सा रहता है
ये बात उस से कहो भी तो सोच कर कहना

कभी वो चाँद जो पूछे के शहर कैसा है ?
बुझे बुझे हुए लगते हैं बाम-ओ-दर कहना

हमारे बाद अजीजो, हमारा अफसाना !!!
कभी जो याद भी आए तो मुख्तासिर कहना

वो एक मैं की मेरा शहर भर को अपने सिवा
तेरी वफ़ा के तकाज़ों से बे-खबर कहना

वो एक तू की तेरा हर किसी को मेरे बग़ैर
मुआमलात-ए-मोहब्बत में मोतबर कहना

वफ़ा की तर्ज़ है मोहसिन के मसलिहत क्या है
ये तेरा दुश्मन-ए-जान को भी चारा-गर कहना

MOHSIN NAQVI SHAYARI IN HINDI
मोहसिन नकवी हिन्दी शायरी

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